Friday, April 16

पता ही नही चला कब छोटी कपड़े वाली लड़कियाँ कैरेक्टरलेस हो गयीं, और हम माँ बहन करने लगे

बहुत छोटी उम्र से ही कब और कैसे यह बैठ गया कि छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियां कैरेक्टरलेस होती हैं, मुझे पता नहीं चला.

वह निहायत क्रिकेटी दौर था.. बैट बॉल उठा सुबह ही निकल पड़ते. खेलते-खेलते कब एक दूसरे की मां-बहन को गालियां देने लगते, यह भी हम लोगों को पता नहीं चलता.

खेल के खिलाड़ी होने से पहले उसे देखने का दौर होता है. खेलने भर जितना टैलेंट जुटा लेने से पहले मैं गांव के बड़े लड़कों को खेलते देखने जाता. ग्राउंड के बाहर बैटिंग करने वाली टीम के आराम फरमा रहे खिलाड़ी जब कानाफूसी करते तो मैं भी उन्हें कान दे बैठता.

वे सब सीनियर थे और अपनी हमउम्र लड़कियों की बातें किया करते. उनकी ज्यादा समझ नहीं आतीं लेकिन हिंदी सिनेमा देखकर बड़े होने वाली जमात का बच्चा इतनी सी समझ बना पाया था कि लड़कियां प्यार करने के लिए होती हैं.

चौथी क्लास में थे. क्लास में दिल्ली के किसी सेन्टर स्कूल से पढ़कर आई एक लड़की का हेयरस्टाइल हमारी क्लास की बाकी लड़कियों की रिबनों में गुथीं चोटियों से अलग था. ‘लड़कियां प्यार करने की कोई चीज़ होती हैं’ इतनी समझ वाले हम कई लड़के उस लड़की को प्यार करने का दावा करते. एक जो सबसे ज्यादा दावा करता था उसने उस लड़की को प्रेम पत्र लिखा और प्रेम पत्र के नीचे अपना नाम लिखने की बजाय हमारे नाम लिख दिए. लड़की ने चिठी पढ़कर आगे मास्टरों को बढ़ा दी. उस दिन हुई हमारी सुताई की गवाही पूरा स्कूल आज भी देने को तैयार होगा.

यह सातवीं कक्षा के दिन थे जब होस्टल में जाकर मां-बहन की गालियां देने का स्तर ऊंचा उठा लिया था. अब हम गालियां बकने के अलावा घड़ते भी थे ताकि हमउम्रों के बीच फाका मस्ती कायम रहे यानी जलवा कायम रहे. इसी दौरान होस्टल में बड़े बच्चों द्वारा छोटी क्लास के बच्चों को सेक्सयूअल्ली एब्यूज किये जाने के बारे में पता चला. जिनको एब्यूज किया जाता. उनको हम भी छेड़ते. उनके पिछवाड़े में उंगली लगाते. जब वह गुस्सा करता तो उसको कहते, ‘फलाने का **ड भी ओट ले है. अर माहरी आंगली तै भी दिक्कत हो है’ मतलब कि उस बच्चे को उसके साथ हो रही बदसलूकी के लिए जलील करते.

स्कूल में पढ़ाई की बजाय स्पोर्ट्स में दिमाग और शरीर खपाने का परिणाम यह हुआ कि हम कक्षा 8 तक आते आते कई खेलों के अच्छे खिलाड़ी बन उभरे. स्पोर्ट्स वाले कोच जब लड़कियों के साथ बदसलूकी करते तो लड़कियों का ही मज़ाक बनाते. एक कोच हमारी क्लास की एक लड़की को तंग करता था. हम पीठ पीछे उस लड़की को ‘कोच की चेली’ बताकर उसपर हंसते.

जब दसवीं पास कर शहर के एक स्कूल में ग्याहरवीं में दाखिल हुए तो गांव से रोडवेज बस पकड़ स्कूल पहुंचते. बस में कॉलेज में पढ़ने जाने वाले लड़के अपनी हमउम्र लड़कियों पर कमेंट करते. एक कागज के टुकड़े पर फोन नम्बर लिख लड़कियों पर फेंकते. जो यह काम हर रोज करता, उसको सब हीरो समझते. 12वीं तक आते आते लड़कियों पर कमेंट करना टाइप काम मैं भी सिख गया था.

उस बस में चढ़ स्कूल तक पहुंचने के सफर से यह समझ आया कि गांव से बस में चढ़ शहर कॉलेज जाने वाली लड़कियां बिगड़ जाती हैं और लड़कों के पट जाती हैं. इसलिए अपने घर की लड़कियों को शहर कॉलेज में पढ़ने के लिए नहीं भेजना चाहिए.

बाहरवीं पास की थी तो पंजाबी सिंगर राज ब्राड का ‘चंडीगढ़ दे नजारयां ने पट्टया’ गाना सुनता था. तो समझ आया कि असली मजे चंडीगढ़ में ही लिए जा सकते हैं और चंडीगढ़ की लड़कियां सुंदर होती हैं और आसानी से पट भी जाती हैं.

कॉलेज के छटे सेमेस्टर में मैंने मेरे से एक साल जूनियर एक लड़के से कहा था, ‘अगर यूनिवर्सिटी में न आते और इस लाइब्रेरी तक न पहुंचते तो हमारा क्या हाल होता.’
पहले सेमेस्टर में जो दोस्त बने उनसे जब यह पता चला कि वह भी चंडीगढ़ पढ़ने इसलिए आए हैं ताकि सुंदर लड़की सेट हो सकें. सामूहिक चर्चा कर मंशा को अंजाम तक पहुंचाने के लिए लड़कियों के पीछे गेड़ी मारते, उनको सोशल मीडिया पर मैसेज भेजते.

पंजाब वाले दोस्तों से लड़कियों को ‘पुर्जा’ कहना सीखा तो मैंने उनको ‘गंडास’ जैसे शब्द सिखाए. लेकिन दूसरे सेमेस्टर तक आते आते कई चीजें समझ आ गईं थीं.
यूनिवर्सिटी में धरने प्रदर्शन होते वहां जाते. वहां जाते तो कई लोग हमें राइट विंग का बताते. हमारे विचारों के लिए हमें धमकाते और हमारी खिल्ली उड़ाते. मैंने एक बार धरने पर लोगों को बताया था कि यज्ञ करने से ऑक्सीजन बनती है और गाय हमारी माता है. एक बार बताया कि रेप सिर्फ लड़कों की वजह से नहीं होते.
कैंटीन और धरने प्रदर्शनों पर होने वाली तीखी बहसों ने लाइब्रेरी के दरवाजे खोले और लाइब्रेरी ने दिमाग के.

दिमाग के दरवाजे बेशक उस समय खुल गए हों लेकिन दिमाग पर जमी धूल की परत आराम आराम से हटी या अभी हट ही रही थी कि पढ़ने के दिल्ली आना हुआ.
दिल्ली में आकर ‘मोहल्ला अस्सी’ फ़िल्म देखी तो सीखा ‘चूतिया और भोसडीके’ कहना ट्रेंडी दिखना है. सो हम भी कई दिन तक ट्रेंडी दिखने वालों की जमात में जीभ हिलाते रहे.

इस उम्र तक आते आते और समझते-सीखते पीछे देखता हूँ तो पाता हूँ कि सेक्सिएस्ट गालियां एक टन से ज्यादा दे चुका. उस बस के सफर में कई लड़कियों पर कमेंट करता फिरा. घर की लड़कियों पर ‘तथाकथित सुरक्षा’ के नाम पर पाबंदियां थोपता रहा. पीड़िताओं के खिलाफ गलत प्रचार करता रहा. कॉलेज के शुरुआती दिनों में लड़कियों का पीछा करता रहा, उन्हें ‘Hi, Hello, Beautiful’ टाइप मैसेज भेजता रहा. हालांकि एक बार दो लड़कियों ने मुझे भी अनकंफरटेबल फील (दोनों अलग मामले) करवाया है.

दिमाग का सबसे अधिक गर्दा ग्राउंड रिपोर्टर बनकर झड़ा. समझ आया कि ‘चूतिया, भोसडीका’ या मां बहन की गालियां देने से आदमी कूल नहीं बनता. बल्कि यह शर्म का विषय है. समझ आया कि लड़कियों की सुरक्षा को खतरा पैदा करने वाले लोग घर में आकर अपनी घर की लड़कियों पर पाबंदियां लगाते हैं. समझ आया कि लड़कियों को बार बार सोशल मीडिया पर मैसेज करने से क्या होता है. समझ आया कि रेप क्यों होते हैं और उनके लिए कौन जिम्मेदार हैं. समझ आया कि हमारे दिमागों में पितृसत्तात्मक समाज के कितने भयंकर कीड़े पड़े हुए हैं. और अभी तो बहुत कुछ समझ आना बाकी भी है.

अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि खंडरनुमा पितृसत्तात्मक समाज में छोटे से बड़े होने के दौरान वो कौन लोग हैं जो मुझे इस कुएं से बाहर खींच लाए हैं. उन खींचने वालों को भी पता है और मुझे भी.

अब कुएं से बाहर निकलकर उसके किनारे खड़ा हूँ और उसकी तरफ झांक रहा हूँ. शर्मिंदा हो रहा हूँ..

इस अपराधबोध से क्या काम चल जाएगा? जवाब मेरे पास भी नहीं है.

जब मीडिया का मीटू आंदोलन चला था तो मैंने लिखा था, ‘किसी के अपराध छप जाते हैं और किसी के छुप जाते हैं.’

Leave a Reply